Punjabi Poetry
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parminder bajwa
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ऐसे चुप है कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे,
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे।

 

अपने ही साये से हर गाम लरज़ जाता हूँ,
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे।

 

कितने नादाँ हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे
याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे।

 

मंज़िलें दूर भी हैं, मंज़िलें नज़दीक भी हैं,
अपने ही पाँवों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे।

 

आज दिल खोल के रोए हैं तो यों खुश हैं ‘फ़राज़’
चंद लमहों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।........................."A"

16 Jul 2012

parminder bajwa
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कोई समझाए ये क्या रंग है मैख़ाने का
आँख साकी की उठे नाम हो पैमाने का।

 

गर्मी-ए-शमा का अफ़साना सुनाने वालों
रक्स देखा नहीं तुमने अभी परवाने का।

 

चश्म-ए-साकी मुझे हर गाम पे याद आती है,
रास्ता भूल न जाऊँ कहीं मैख़ाने का।

 

अब तो हर शाम गुज़रती है उसी कूचे में
ये नतीजा हुआ ना से तेरे समझाने का।

 

मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसाँ ‘इक़बाल’
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का।

 

 

 

 

-

रक्स = Dance
चश्म = Eye
गाम = Step

16 Jul 2012

parminder bajwa
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कोई समझाए ये क्या रंग है मैख़ाने का
आँख साकी की उठे नाम हो पैमाने का।

 

गर्मी-ए-शमा का अफ़साना सुनाने वालों
रक्स देखा नहीं तुमने अभी परवाने का।

 

चश्म-ए-साकी मुझे हर गाम पे याद आती है,
रास्ता भूल न जाऊँ कहीं मैख़ाने का।

 

अब तो हर शाम गुज़रती है उसी कूचे में
ये नतीजा हुआ ना से तेरे समझाने का।

 

मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसाँ ‘इक़बाल’
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का।

 

 

 

 

-

रक्स = Dance
चश्म = Eye
गाम = Step

16 Jul 2012

parminder bajwa
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गली-गली तेरी याद बिछी है, प्यार रस्ता देख के चल
मुझसे इतनी वहशत है तो मेरी हदों से से दूर निकल।

 

एक समय तेरा फूल-सा नाज़ुक हाथ था मेरे शानों पर
एक ये वक़्त कि मैं तनहा और दुख के काँटों का जंगल।

 

याद है अब तक तुझसे बिछड़ने की वो अँधेरी शाम मुझे
तू ख़ामोश खड़ा था लेकिन बातें करता था काजल।

 

मेरा मुँह क्या देख रहा है, देख उस काली रात तो देख
मैं वही तेरा हमराही हूँ, साथ मेरे चलना है तो चल।

16 Jul 2012

parminder bajwa
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दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया
इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया

 

 

 

–

हमको किसके ग़म ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही।

 

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही।

 

नफ़रतों के तीर खाकर दोस्तों के शहर में
हमने किस-किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही।

 

क्या बताएँ प्यार की बाज़ी वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही।

16 Jul 2012

parminder bajwa
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वो किसी का हो गया है, उसको क्यों कर ढूँढ़िये?
दिल से आज जो गया है, उसको क्यों कर ढूँढ़िये?

 

ज़िन्दग़ी सीम आब है कब हाथ आई है भला
मिल के भी जो खो गया है उसको क्यों कर ढूँढ़िये?

 

प्यार की ख़ातिर जो रोया ज़िन्दग़ी की शाम तक
ले के नफ़रत से गया है उसको क्यों कर ढूँढ़िये?

 

ढूँढ़कर लाया था दुनिया भर की खुशियाँ जो कभी
ढूँढ़ने ख़ुद को गया है उसको क्यों कर ढूँढ़िये?

 

ढूँढ़िये ‘मख़मूर’ उसको जो कहीं दुनिया में हो
दिल की तह तक जो गया है उसको क्यों कर ढूँढ़िये?

16 Jul 2012

parminder bajwa
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मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते?
हर बार कोई ज़ख़्म नया क्यों नहीं देते?

 

ये रात, ये तनहाई, ये सुनसान दरीचे
चुपके से मुझे आके सदा क्यों नहीं देते।

 

है जान से प्यारा मुझे ये दर्द-ए-मोहब्बत
कब मैंने कहा तुमसे दवा क्यों नहीं देते।

 

गर अपना समझते हो तो फिर दिल में जगह दो
हूँ ग़ैर तो महफ़िल से उठा क्यों नहीं देते।

16 Jul 2012

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हवा का ज़ोर भी काफ़ी बहाना होता है
अगर चिराग किसी को जलाना होता है।

 

ज़ुबानी दाग़ बहुत लोग करते रहते हैं,
जुनूँ के काम को कर के दिखाना होता है।

 

हमारे शहर में ये कौन अजनबी आया
कि रोज़ _____ सफ़र पे रवाना होता है।

 

कि तू भी याद  नहीं आता ये तो होना था
गए दिनों को सभी को भुलाना होता है।

16 Jul 2012

parminder bajwa
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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है?
तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-ग़ुफ़्तगू क्या है?

 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है?

 

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है?

 

रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार और हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है?

–

 

 

ग़ुफ़्तगू = Conversation
अंदाज़-ए-ग़ुफ़्तगू = Style of Conversation
पैराहन = Shirt, Robe, Clothe
हाजत-ए-रफ़ू = Need of mending (हाजत = Need)
गुफ़्तार = Conversation
ताक़त-ए-गुफ़्तार = Strength for Conversation

16 Jul 2012

parminder bajwa
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया है मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।

 

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे।

 

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।

 

ईमान मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।

 

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।

16 Jul 2012

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