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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है, अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं।
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं।
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम हैं।
16 Jul 2012
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पे रौनक वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
देखिए पाते हैं उशशाक़ बुतों से क्या फ़ैज़ इक बराह्मन ने कहा है कि ये साल अच्छा है।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीकत लेकिन दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
16 Jul 2012
हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले न थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले।
है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िन्दग़ी से पहले।
मेरा प्यार जल रहा है अरे चाँद आज छुप जा कभी प्यार था हमें भी तेरी चाँदनी से पहले।
मैं कभी न मुसकुराता जो मुझे ये इल्म होता कि हज़ारों ग़म मिलेंगे मुझे इक खुशी से पहले।
ये अजीब इम्तिहाँ है कि तुम्हीं को भूलना है मिले कब थे इस तरह हम तुम्हें बेदिली से पहले।
हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले न थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले।
है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िन्दग़ी से पहले।
मेरा प्यार जल रहा है अरे चाँद आज छुप जा कभी प्यार था हमें भी तेरी चाँदनी से पहले।
मैं कभी न मुसकुराता जो मुझे ये इल्म होता कि हज़ारों ग़म मिलेंगे मुझे इक खुशी से पहले।
ये अजीब इम्तिहाँ है कि तुम्हीं को भूलना है मिले कब थे इस तरह हम तुम्हें बेदिली से पहले।
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16 Jul 2012
आँखों के इंतज़ार का दे कर हुनर चला गया, चाहा था एक शख़्स को जाने किधर चला गया।
दिन की वो महफिलें गईं, रातों के रतजगे गए कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया।
झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़याल यार भी, हर-सू बिखर-बिखर गई ख़ुशबू जिधर चला गया।
उसके ही दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है, देके वो अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर चला गया
कूचा-ब-कूचा दर-ब-दर कब से भटक रहा है दिल, हमको भुला के राह वो अपनी डगर चला गया।
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आँखों के इंतज़ार का दे कर हुनर चला गया, चाहा था एक शख़्स को जाने किधर चला गया।
दिन की वो महफिलें गईं, रातों के रतजगे गए कोई समेट कर मेरे शाम-ओ-सहर चला गया।
झोंका है एक बहार का रंग-ए-ख़याल यार भी, हर-सू बिखर-बिखर गई ख़ुशबू जिधर चला गया।
उसके ही दम से दिल में आज धूप भी चाँदनी भी है, देके वो अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर चला गया
कूचा-ब-कूचा दर-ब-दर कब से भटक रहा है दिल, हमको भुला के राह वो अपनी डगर चला गया।
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16 Jul 2012
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना कि खुशी से मर न जाते ग़र ऐतबार होता।
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह कोई चारासाज होता कोई ग़म-गुसार होता
कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।
कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना कि खुशी से मर न जाते ग़र ऐतबार होता।
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह कोई चारासाज होता कोई ग़म-गुसार होता
कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।
कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।
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16 Jul 2012
तक़लीफ़-ए-हिज्र दे गई राहत कभी-कभी बदला है यों भी रंग-ए-मोहब्बत कभी-कभी।
दिल मे तेरी जफ़ा को सहारा समझ लिया
गुज़री है यों भी हम पे मुसीबत कभी-कभी।
दुनिया समझ न ले तेरे ग़म की नज़ाकतें करता हूँ ज़ेर-ए-लब शिक़ायत कभी-कभी।
है जिस तरफ़ निग़ाह तवज्जो उधर नहीं होती है बेरुख़ी भी इनायत कभी-कभी।
आई शब-ए-फिराक़ तो घबरा गए ‘शजी’ आती है ज़िन्दगी में क़यामत कभी-कभी।
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तक़लीफ़-ए-हिज्र दे गई राहत कभी-कभी बदला है यों भी रंग-ए-मोहब्बत कभी-कभी।
दिल मे तेरी जफ़ा को सहारा समझ लिया
गुज़री है यों भी हम पे मुसीबत कभी-कभी।
दुनिया समझ न ले तेरे ग़म की नज़ाकतें करता हूँ ज़ेर-ए-लब शिक़ायत कभी-कभी।
है जिस तरफ़ निग़ाह तवज्जो उधर नहीं होती है बेरुख़ी भी इनायत कभी-कभी।
आई शब-ए-फिराक़ तो घबरा गए ‘शजी’ आती है ज़िन्दगी में क़यामत कभी-कभी।
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16 Jul 2012
मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो मुझे तुम कभी भी भुला न सकोगे।
न जाने मुझे क्यों यक़ीं हो चला है मेरे प्यार को तुम मिटा न सकोगे।
मेरी याद होगी जिधर जाओगे तुम कभी नग़मा बन के, कभी बन के आँसू।
तड़पता मुझे हर तरफ पाओगे तुम। शमा जो जलाई है मेरी वफ़ा ने
बुझाना भी चाहो बुझा न सकोगे।
कभी नाम बातों में आया जो मेरा तो बेचैन हो-हो के दिल थाम लोगे। निग़ाहों में छाएगा ग़म का अँधेरा। किसी ने जो पूछा सबब आँसुओं का बताना भी चाहो बता न सकोगे।
मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो मुझे तुम कभी भी भुला न सकोगे।
न जाने मुझे क्यों यक़ीं हो चला है मेरे प्यार को तुम मिटा न सकोगे।
मेरी याद होगी जिधर जाओगे तुम कभी नग़मा बन के, कभी बन के आँसू।
तड़पता मुझे हर तरफ पाओगे तुम। शमा जो जलाई है मेरी वफ़ा ने
बुझाना भी चाहो बुझा न सकोगे।
कभी नाम बातों में आया जो मेरा तो बेचैन हो-हो के दिल थाम लोगे। निग़ाहों में छाएगा ग़म का अँधेरा। किसी ने जो पूछा सबब आँसुओं का बताना भी चाहो बता न सकोगे।
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16 Jul 2012
ख़ुदा करे कि मोहब्बत में ये मक़ाम आए किसी का नाम लूँ लब पे तुम्हारा नाम आए।
कुछ इस तरह से जिए ज़िन्दग़ी बसर न हुई तुम्हारे बाद किसी रात की सहर न हुई सहर नज़र से मिले ज़ुल्फ़ ले के शाम आए।
ख़ुद अपने घर में वो मेहमान बन के आए हैं सितम तो देखिए अनजान बन के आए हैं हमारे दिल की तड़प आज कुछ तो काम आए।
वही है साज़ वही गीत है वही मंज़र हर एक चीज़ वही है नहीं है तुम वो मगर उसी तरह से निग़ाहें उठें, सलाम आए।
ख़ुदा करे कि मोहब्बत में ये मक़ाम आए किसी का नाम लूँ लब पे तुम्हारा नाम आए।
कुछ इस तरह से जिए ज़िन्दग़ी बसर न हुई तुम्हारे बाद किसी रात की सहर न हुई सहर नज़र से मिले ज़ुल्फ़ ले के शाम आए।
ख़ुद अपने घर में वो मेहमान बन के आए हैं सितम तो देखिए अनजान बन के आए हैं हमारे दिल की तड़प आज कुछ तो काम आए।
वही है साज़ वही गीत है वही मंज़र हर एक चीज़ वही है नहीं है तुम वो मगर उसी तरह से निग़ाहें उठें, सलाम आए।
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16 Jul 2012
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए उसके बाद आए जो अज़ाब आए।
बाम-ए-मीना से माहताब तेरे दस्त-ए-साकी में आफ़ताब आए।
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब आज तुम याद बेहिसाब आए।
हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चरागाँ हो सामने फिर वो फिर बेनक़ाब आए।
‘फ़ैज़’ थी राह सर-बसर मंज़िल हम जहाँ पहुँचे क़ामयाब आए।
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए उसके बाद आए जो अज़ाब आए।
बाम-ए-मीना से माहताब तेरे दस्त-ए-साकी में आफ़ताब आए।
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब आज तुम याद बेहिसाब आए।
हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चरागाँ हो सामने फिर वो फिर बेनक़ाब आए।
‘फ़ैज़’ थी राह सर-बसर मंज़िल हम जहाँ पहुँचे क़ामयाब आए।
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16 Jul 2012
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कैसे-कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं, अपने-अपने ग़म के फ़साने हमें सुनाने आ जाते हैं।
मेरे लिए ये ग़ैर हैं और मैं इनके लिए बेगाना हूँ फिर एक रस्म-ए-जहाँ है जिसे निभाने आ जाते हैं।
इनसे अलग मैं रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में मेरी ये मजबूरी मुझको याद दिलाने आ जाते हैं।
सबकी सुनकर चुप रहते हैं, दिल की बात नहीं कहते आते-आते जीने के भी लाख बहाने आ जाते हैं।
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मेरे लिए ये ग़ैर हैं और मैं इनके लिए बेगाना हूँ फिर एक रस्म-ए-जहाँ है जिसे निभाने आ जाते हैं।
इनसे अलग मैं रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में मेरी ये मजबूरी मुझको याद दिलाने आ जाते हैं।
सबकी सुनकर चुप रहते हैं, दिल की बात नहीं कहते आते-आते जीने के भी लाख बहाने आ जाते हैं।
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16 Jul 2012
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